आदि शंकराचार्य की जीवनी | Adi Shankaracharya Biography

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Adi Shankaracharya: Life, History, and Inspiring Stories

आदि शंकराचार्य: जीवन, इतिहास और प्रेरक कहानियाँ

मुख्य बिंदु:

  • जन्म: 788 ईस्वी, कालडी, केरल।
  • माता-पिता: शिवगुरु और आर्यांबा।
  • शिक्षा: गुरु गोविंद भगवत्पाद के सान्निध्य में।
  • योगदान: अद्वैत वेदांत दर्शन का प्रचार, मठों की स्थापना।
  • प्रमुख कृतियाँ: उपनिषद भाष्य, भगवद गीता भाष्य, ब्रह्मसूत्र भाष्य।
  • निधन: 32 वर्ष की आयु में, केदारनाथ, उत्तराखंड।

केरल के कालडी नामक छोटे से गाँव में शिवगुरु और आर्यांबा के घर एक अद्भुत बालक का जन्म हुआ। यह बच्चा कोई साधारण बालक नहीं था; उसके जन्म से पहले ही माता-पिता ने भगवान शिव से संतान प्राप्ति के लिए तपस्या की थी। भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया, और यही बालक आगे चलकर आदि शंकराचार्य के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

बचपन से ही शंकर का झुकाव आध्यात्म और ज्ञान की ओर था। पाँच वर्ष की आयु में ही उन्होंने वेदों का अध्ययन शुरू कर दिया था। उनकी तीव्र बुद्धि देखकर सभी अचंभित रह जाते थे। एक दिन, जब वह नदी किनारे स्नान कर रहे थे, तो एक मगरमच्छ ने उनके पैर को पकड़ लिया। उन्होंने अपनी माँ से संन्यास की अनुमति मांगी, यह कहते हुए कि केवल भगवान की शरण में जाने से ही वह बच सकते हैं। माँ ने सहमति दी, और इसी घटना ने उनके जीवन को मोड़ दिया।


गुरु की खोज और ज्ञान की प्राप्ति

स्नातक के बाद, शंकराचार्य ने अपने जीवन का उद्देश्य तय किया: भारतीय संस्कृति और वेदांत दर्शन को पुनर्जीवित करना। उन्होंने अपने गुरु गोविंद भगवत्पाद को ढूँढने के लिए लंबी यात्रा की। मध्य प्रदेश के ओंकारेश्वर में उनकी मुलाकात गुरु से हुई। गुरु ने शंकर की विद्वता को परखा और उन्हें अद्वैत वेदांत का ज्ञान दिया। अद्वैत वेदांत का मुख्य सिद्धांत है कि ब्रह्म और आत्मा एक ही हैं।

गुरु की शिक्षा प्राप्त करने के बाद, शंकराचार्य ने भारत के कोने-कोने में जाकर ज्ञान का प्रचार करना शुरू किया। उनकी विद्वता इतनी अद्भुत थी कि हर कोई उनके तर्कों और ज्ञान के आगे नतमस्तक हो जाता था।


जीवन बदलने वाली घटनाएँ

मंडन मिश्र से वाद-विवाद

एक बार शंकराचार्य का सामना विद्वान मंडन मिश्र से हुआ। यह वाद-विवाद भारतीय दर्शन के इतिहास का एक अद्वितीय अध्याय बन गया। मंडन मिश्र के घर में वाद-विवाद के निर्णायक के रूप में उनकी पत्नी, भवानी, बैठीं। वाद-विवाद महीनों तक चला। अंततः शंकराचार्य विजयी हुए। लेकिन भवानी ने एक और शर्त रखी—उनसे जीवन के गृहस्थ आश्रम का अनुभव प्राप्त किए बिना पूर्ण ज्ञान को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

इस चुनौती को स्वीकार करते हुए शंकराचार्य ने एक अद्भुत कार्य किया। उन्होंने योगबल से एक राजा के मृत शरीर में प्रवेश कर गृहस्थ जीवन के रहस्यों को समझा। इस घटना ने उनकी आध्यात्मिक गहराई को और भी मजबूत किया।

काशी के चांडाल की कथा

काशी यात्रा के दौरान एक और घटना घटी जिसने उनके अद्वैत सिद्धांत को और भी सुदृढ़ किया। एक दिन, गंगा किनारे शंकराचार्य का सामना एक चांडाल से हुआ। चांडाल ने उनसे पूछा, “आप किससे दूर हटना चाहते हैं, मेरे शरीर से या मेरी आत्मा से?” इस प्रश्न ने शंकराचार्य को गहराई से झकझोर दिया। उन्होंने महसूस किया कि आत्मा सभी में एक समान है। यह घटना उनके अद्वैत वेदांत के प्रचार में एक मील का पत्थर बनी।


मठों की स्थापना

शंकराचार्य ने भारत के चारों दिशाओं में चार प्रमुख मठों की स्थापना की:

  1. ज्योतिर्मठ (उत्तराखंड): हिमालय की गोद में स्थापित।
  2. शारदा पीठ (कर्नाटक): दक्षिण भारत में ज्ञान का केंद्र।
  3. गोवर्धन मठ (उड़ीसा): पूर्व दिशा में वैदिक शिक्षा का प्रचार।
  4. द्वारका मठ (गुजरात): पश्चिम दिशा में धर्म और ज्ञान का संगम।

इन मठों के माध्यम से उन्होंने भारतीय समाज को एकता के सूत्र में बांधने का प्रयास किया।


निर्वाण षट्कम् की रचना

आदि शंकराचार्य की प्रसिद्ध रचना “निर्वाण षट्कम्” उनकी अद्वैत वेदांत की दृष्टि का सजीव उदाहरण है। कहा जाता है कि इसकी रचना उन्होंने उस समय की जब वे केवल आठ वर्ष के थे। काशी में एक दिन, शंकराचार्य का सामना भगवान शिव के अवतार में एक चांडाल से हुआ। चांडाल ने शंकराचार्य को आत्मा और शरीर के भेद पर गहन प्रश्न पूछे। इस घटना ने उन्हें अद्वैत सिद्धांत को और गहराई से समझने की प्रेरणा दी।

इस रचना के कुछ प्रसिद्ध श्लोक इस प्रकार हैं:

मनोबुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहम्।
न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे।
न च व्योम भूमिर् न तेजो न वायुः।
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥

न मृत्युर्न शंका न मे जातिभेदः।
पिता नैव मे नैव माता न जन्म।
न बन्धुर् न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः।
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥

इन श्लोकों में आत्मा की शुद्धता और ब्रह्म के साथ उसकी एकरूपता का वर्णन है। निर्वाण षट्कम् उनकी आध्यात्मिक दृष्टि का अमूल्य योगदान है।


काशी में अद्वैत का प्रचार

काशी नगरी में शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत के सिद्धांतों का प्रचार किया। उन्होंने वहां पर अनेक विद्वानों को तर्क और ज्ञान के माध्यम से परास्त किया। काशी में उनकी प्रसिद्धि इतनी बढ़ी कि लोग उन्हें भगवान शिव का अवतार मानने लगे।


प्रमुख कृतियाँ और रचनाएँ

आदि शंकराचार्य ने वेदांत के अद्वैत सिद्धांत को स्पष्ट करने के लिए अनेक ग्रंथों की रचना की। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं:

  • ब्रह्मसूत्र भाष्य: वेदांत के गूढ़ अर्थ को समझाने वाला महान ग्रंथ।
  • भगवद गीता भाष्य: गीता के श्लोकों पर आधारित दार्शनिक व्याख्या।
  • उपनिषद भाष्य: विभिन्न उपनिषदों पर टिप्पणियाँ।
  • सौंदर्य लहरी: भक्ति और काव्य का सुंदर संगम।
  • विवेकचूडामणि: अद्वैत वेदांत पर आधारित सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ।

अंतिम यात्रा

32 वर्ष की अल्पायु में ही उन्होंने अपने जीवन का कार्य पूर्ण कर लिया। कहा जाता है कि केदारनाथ में उन्होंने समाधि ली। उनके अनुयायियों का मानना है कि उन्होंने योगबल से अपने शरीर को त्याग दिया। उनकी समाधि आज भी केदारनाथ में स्थित है और यह स्थान लाखों भक्तों और विद्वानों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।


प्रेरणा

आदि शंकराचार्य ने यह सिद्ध कर दिया कि सही दिशा और उद्देश्य के साथ, कम समय में भी महान कार्य किए जा सकते हैं। उनकी कहानियाँ, विचार और अद्वैत वेदांत के सिद्धांत आज भी हमें प्रेरणा देते हैं। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि हर व्यक्ति में ईश्वर का अंश है और आत्मा को पहचानना ही जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य है।

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